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Automatic Shri Hanuman Statue in Delhi


Departed Mahant Nagababa Sevagir ji Maharaj used to tell his disciples – when I was in my teens and searching the ultimate place for worship, I found this place to be one. Here a small ‘Dhuna’ (Vessel of sacred ash) of Shivji and a small idol of Hanumanji existed then.

After years of non-stop ‘Tapasya’ (Penance) with austerity, it was told by Babaji, Hanumanji appeared in person and expressed his wish for his grand statue.

And hence a firm decision was taken by Babaji to materialise the wish of Hanumanji. The project began on 13th May, 1994 and in thirteen years came into existence the world’s unique statue of Hanumanji.

As in epic ‘Ramayan’ the statue of Hanumanji, through its automatic electronic system, shows the presence of Lord Rama and Goddess Sita in his chest by tearing it from the middle thousands of people gather around the statue to have a glimpse (of opening of the chest and coming out of the idols of Lord Rama and Goddess Sita from the chest) and get exalted. The sacred event is arranged by the temple trust twice a week on Tuesdays and Saturdays at 8.15 a.m. and 8.15 p.m.

It seems Hanumanji deliberately picked one of his most devoted worshippers in Babaji for this great task. Babaji incessantly continued construction work. The popularity of the Shiva’s DHUNA (vessel of sacred ash) was also rising alongwith the construction work of statue of Hanumanji as the devotees were getting their wishes fulfilled by his grace. It is believed whoever wishes something before this place, gets it fulfilled.

Goddess Vaishnu Devi too graced the place by appearing in the form of Pindi (sacred lump). The sacred cave of Vaishno Devi, which is identical with that in Vaishno Devi Shrine in Jammu & Kashmir has also acquired popularity amongst the pilgrims. The sacred Ganga too has appeared into this cave, who offers Her Darshan (SIGHT) in the form of sacred water.

On 30th March, 2006, the sacred Jyoti (flame) was brought here by Babaji from the world famous temple of Jwalaji at Kangra, Himachal Pradesh. The flame is incessantly alight Shirdi’s Sai Baba and Goddess of Dwarka appear to offer their Darshan (SIGHT) to the devotees here Shani Maharaj’s sacrosanct temple within the premises of the 108 ft. Sankat Mochan Dham attracts lacs of devotees. Devotees offer black cloth, a (symbolic) knife, mustard oil, earthern lam, jaggery (gur), gram (chana), horse bean (Urad Dal), sesame (Til), iron in any form, garland of flowers and lemons etc. here.

Babaji had resolved to renounce this world as and when the task of completion of the statue was over. So, on 25th January, 2008, he renounced this world.

The disciples of Babaji have established a memorial (Samadhi) of Babaji at the place where he had first offered his prayers. It has also been resolved by the Trust that on 25th January (the days of Babaji’s Nirvan), Saints, Mahants, Priests from all over the country assemble at the temple premises. A grand Bhandara (community feast) has also been decided to be offered on this occasion every year.

प्राचीन हनुमान मन्दिर (108 फुट संकट मोचन धाम) का इतिहास

ब्रह्मालीन श्रीमहन्त नागबाबा सेवागिर जी महाराज बतलाते थे कि जब वह तरूण (नौजवान) अवस्था में थें तथा अपनी तपस्थली की खोज में भ्रमण कर रहे थे तभी अचानक इस स्थान (यहां पर 108 फुट हनुमान जी की मूर्ति है।) पर आते ही उन्हे आभास हुआ कि उनकी तपस्थली तप की भूमि यही है। उस वक्त यहां पर एक छोटा भगवान शिवजी का धूना एवम्‌ हनुमानजी की प्रतिमा विद्यमान थी। अनेक वर्षो की तपस्या में लीन रहते हुए एक दिन बाबाजी को हनुमानजी ने साक्षात दर्शन दिये और कहा की इस स्थान पर मेरी मूर्ति का निर्माण करवाना। तभी पूजनीय बाबाजी ने निर्णय लिया कि इस स्थान पर भगवान हनुमानजी का भव्य मन्दिर का निर्माण करेंगें और उन्होने इस कार्य को 13.05.1994 से आरम्भ कराया तथा 13 वर्षों तक चले कार्य द्वारा दुनिया की सबसे बड़ी स्वचालित भगवान हनुमानजी की मूर्ति की स्थापना 02 अप्रैल, 2007 को सम्पन्न हुई। इस मूर्ति में हनुमानजी अपनी छाती फाड़ते हैं और भगवान श्री रामजी व माता सीताजी छाती से बाहर आकर दर्शन देते हैं और लाखो भक्त प्रभू के दर्शन पा कर धन्य होते है। मन्दिर ट्रस्ट द्वारा हनुमानजी का अपनी छाती फाड़कर दर्शन केवल मंगलवार व शनिवार को प्रातः 8.15 बजे और सांय 8.15 बजे पर ही होता है।
ऐसा लगता है कि हनुमानजी ने अपना कार्य करने के लिये बाबाजी को चुना और बाबाजी इस स्थान पर पूजा अर्चना तप करते रहे। शनैः शनैः हनुमान जी का कार्य प्रगति पकड़ता गया। श्री हनुमान जी के कार्य के साथ-साथ भगवान शिव के धूने की महिमा भी बढ़ती जा रही थी लोग धूने पर आकर मन्नत मागते थे तो तुरन्त उनका कार्य हो जाता था। इसके साथ-साथ साक्षात मॉं वैष्णों देवी भी पिण्डी स्वरूप में इस स्थान पर विराजमान हो गयी। गुफा भी साक्षात मॉं वैष्णों रूप में है। गंगा माता भी स्वंय गुफा में प्रकट हो गई हैं। वो भी अपने जलस्वरूप में भक्तों को दर्शन देती हैं और भक्त भी मॉ वैष्णों का गंगा के दर्शन पा कर धन्य हो जाते हैं। इसके साथ-साथ मॉं ज्वालाजी (कांगड़ा हिमाचल प्रदेश) से बाबाजी ने मॉ की ज्योति 30 मार्च, 2006 को लाकर स्थापित की जो निरन्तर प्रज्जवलित है व भगवान सिरडी बाले सांई बाबाजी, द्वारका माई के साथ साक्षात दर्शन देते हैं। साक्षात शनि महाराज लाखों भक्तों की मनोकामना पूरी करने के लिए इसी स्थान पर स्थापित हैं, जिनका शनिवार वाले दिन लाखों भक्त दर्शन करके अपने जीवन को धन्य बनाते हैं। भक्तगण शनिदेवजी की थाली जिसमें काला कपडा, चाकू, तेल, दिया, गुड़चने, उड़द दाल, तिल, लोहा, छतरी, काला समान, फूलमाला, नींबू की माला चढ़ाई जाती है।
इन सभी कार्यो को करने के लिए श्री बाबाजी ने सकंल्प लिया था कि जब श्री हनुमान जी की मूर्ति का कार्य पूर्ण हो जायेगा तो में अपना शरीर त्याग दूंगा और बाबाजी ने 25 जनवरी, 2008 को मन्दिर में अपना शरीर त्याग कर प्रभू की शरण में चले गये और उसी स्थान पर मन्दिर के भक्तों ने बाबाजी की समाधि बना दी जहां पर बाबाजी ने प्रथम बार मन्दिर में तपस्या की थी। अब हर वर्ष 25 जनवरी को हिन्दुस्तान के सभी महात्माओं, महन्तों, संतो और पुजारियों को निमन्त्रण देकर भण्डारा कराया जाता है।

 
 
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